Thursday, 14 May 2020

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 2 


हमलोग चार भाई बहन थे, तीन बहन और एक भाई। तीनो बहनों में मैं सबसे छोटी थी और भाई हम सबसे छोटा। वह मुझसे आठ वर्ष छोटा है। उसके जन्म होने के पहले मैं घर में सबकी लाड़ली थी । उस ज़माने में बेटे और बेटियों में बहुत भेद-भाव किया जाता था। वैसे तो यह फ़र्क आज भी किसी न किसी रूप में बरक़रार है। पर मेरे बाबू जी के विचार बिल्कुल अलग थे। वे अपनी बेटियों को पढ़ाना चाहते थे। पहली दो बेटियों में तो सफ़ल नहीं हो सके, लेकिन मुझे वे पर्याप्त शिक्षा प्रदान करना चाहते थे। शुरू के वर्षों में घर में बेटा नहीं होने के कारण मेरा लालन-पालन भी बेटे के जैसा ही हुआ।

मेरा पहला स्कूल मेरे गांव का भी इकलौता स्कूल था । उसका नाम था 'लालागुरू जी का स्कूल'। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस स्कूल के शिक्षक, कर्ता-धर्ता और सबकुछ एक ही व्यक्ति थे, लालागुरु जी। गुरु जी गांव के बच्चों को वर्णमाला एवं पहाड़ा की शिक्षा देते थे । गांव के लोग इसके बदले में उन्हें जो दक्षिणा देते थे, उसी से उनका जीवन यापन होता था। एक गुरु के द्वारा चलने वाले ऐसे स्कूल आसपास के गावों में काफी प्रचलित थे। स्थानीय भाषा में इसे 'पिंडा' भी कहा जाता था। यहाँ मैंने हिंदी वर्णमाला, गणित में पहाड़ा एवं आसान जोड़ घटाव का ज्ञान हासिल किया। आजकल स्कूलों में 1 से 12 तक ही पहाड़ा सिखाया जाता है । लेकिन लाला गुरु जी के स्कूल में हमने 1 से 30 तक का पहाड़ा से लेकर सवैया, ड्योढ़ा, अढ़ैया, हुट्ठा (ये सब दशमलव के पहाड़े थे: सवैया मतलब 1.25, ड्योढ़ा 1.5, अढ़ैया 2.5, हुट्ठा 3.5) इत्यादि को कंठस्त कर लिया था।

करीब पच्चीस बरसों बाद मेरे बड़े लड़के, अरुण, की प्रारंभिक शिक्षा भी इसी स्कूल से शुरू हुई। उस समय गांव में एक पर्व मनाया जाता था जिसका नाम था चक चंदा। इस पर्व के अवसर पर गुरू जी अपने शिष्यों के साथ घर-घर जाते थे और गीत गा-गाकर गुरु दक्षिणा मांगते थे। मुझे याद है कि अरुण भी गुरुजी एवं अन्य शिष्यों के साथ एक बार हमारे घर आया था। बच्चों ने उसकी आँखों को बंद कर दिया और वे गाने लगे:

"बबुआ रे बबुआ, लाल-लाल ढबुआ
अंखिया लाल-पियर होळौ रे बबुआ,
मैया तोर कठोरा रे बबुआ
बाबू तोर निरमोहिया रे बबुआ
जरियो नै दर्द आवहौ रे बबुआ,
भूख लगल हौ रे बबुआ
प्यास लगल हौ रे बबुआ।

लालागुरु जी के यहाँ मैंने कक्षा एक एवं दो की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद की पढ़ाई के लिए हमारे गांव में कोई विकल्प नहीं था। इसलिए बाबूजी ने मेरा दाखिला पास के गांव, बादपुर, के सरकारी स्कूल में करवा दिया। वह स्कूल मेरे घर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर था। नया स्कूल, नया बस्ता, नयी पुस्तकों को पाकर मैं काफी उत्साहित थी। घर से बाहर जाना, बल्कि गांव से भी दूर स्कूल में जाकर नयी चीजों के बारे में जानना और सीखना, मेरी कल्पना से बिल्कुल परे था। पहले दिन का अनुभव तो एकदम आशा के अनुरूप था --- मैं स्कूल गयी और घर लौट कर आई, पूरे उत्साह और उमंग के साथ।

लेकिन दुसरे दिन मैं जैसे ही घर से बाहर निकली कि मेरे एक चचेरे भाई, जो मुझसे करीब 20 साल बड़े होंगे, ने मुझे रोक कर मेरा बस्ता छीन लिया और गुस्से में आकर कहा, "खबरदार! आज से तुम्हारा स्कूल जाना बंद। इसके बाद अगर मैंने तुम्हें स्कूल जाते हुए देखा तो तुम्हारे हाथ पैर तोड़ दूंगा। "बाद में उन्होंने मेरे बाबूजी को भी इसके लिए बुरा भला कहा। असल में हमारे इस भाई साहब ने हमारे संयुक्त परिवार के प्रतिष्ठा की सुरक्षा का बीड़ा उठा रखा था। इसलिए खासकर औरतों और बेटियों को बाहर भेजने पर उन्होंने पाबन्दी लगा रखी थी। अपने इस दायित्व को वह धर्म के रूप में निभाते थे।

पर बाबूजी ने हार नहीं मानी। अखवार इत्यादि के माध्यम से उन्होंने घर में ही मुझे पढ़ना और लिखना सिखलाया। थोड़ी बड़ी होने के बाद चिट्ठी पढ़ने और लिखने में मुझे दिक्कत नहीं होती थी। गांव में किसी के घर डाक से चिठ्ठी आती तो कई बार लोग मुझे बुलाने आते थे। मैं उनको चिठियां पढ़कर सुनाया करती थी।

अखबार के अलावा धीरे-धीरे मैं धार्मिक पुस्तकें भी पढ़ने लगी। उस समय रामायण, गीता, महाभारत जैसी पुस्तकें लोग घर-घर में पढ़ा करते थे। मेरे गांव में कई ऐसे व्यक्ति थे जिन्हे धार्मिक पुस्तकों की पंक्तियाँ पूरी तरह से याद थी। इन पुस्तकों का पाठ एवं गायन हमारे सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग था।

मेरी उम्र 13 या 14 वर्ष की होगी जब मुझे और मेरी चचेरी बहन, कलावती, को बड़का बाबू शाम को बंगला(दालान) पर बुलाते थे और रामचरितमानस पढ़ने के लिए कहते थे। वे खुद चौकी पर बैठ जाते थे। हम दोनों बहन नीचे चटाई पर। हमलोग मानस की चोपाई का पाठ करते और बड़का बाबू उसका अर्थ कहते थे। बीच में उच्चारण में कोई त्रुटि होने पर वो उसे दूर कर देते थे। बड़का बाबू हमारे बाबू जी के तीन भाईयों में सबसे बड़े थे। कलावती बड़का बाबू की ही बेटी थी। मेरी हमउम्र बहन एवं सहेली भी।

आज संयुक्त परिवार जब समाज से विलुप्त होने के कगार पर है तब समझ में आता है कि कैसे कुछ शब्दों का महत्व भी अब ख़त्म हो रहा है। संयुक्त परिवार में पिता के अन्य भाई भी पिता के समान समझे जाते थे, उन्हें भी उतनी ही इज्जत दी जाती थी। इसलिए बाबू जी के बड़े भाई को बड़का बाबू, मंझला बाबू इत्यादि कहकर पुकारा जाता था। इस तरह के शब्द संयुक्त परिवार को जोड़कर रखने में सहायक सिद्ध होते थे। अब जब संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ज्यादा प्रचलित हो रहा है तो इन शब्दों की शायद जरूरत नहीं रही। शब्दों की भी पदोन्नतिहो गयी है। बाबू या पिता की जगह पापा अथवा डैड ने ले लीहै। बड़का बाबू, मंझला बाबू इत्यादि अब सिमट कर चाचा अथवा अंकल बन गए हैं।

Friday, 24 April 2020

मैया की कहानी, मैया की जुबानी 1



मेरा जन्म पटना से करीब 100 किलोमीटर पूरब एक छोटे से गांव में हुआ, जिसका नाम है शेरपुर। गांव के पूर्वी छोर पर गंगा बहती है, और पश्चिमी छोर पर है दिल्ली से हावड़ा को जोड़ने वाली मुख्य रेल मार्ग। मेरे घर और रेल लाइन के बीच केवल खेत ही खेत थे। बचपन से घर की खिड़की से आती जाती गाड़ियों को देखकर मैं इतना अभ्यस्त हो गयी थी कि केवल समय देखकर और गाड़ी की सीटी सुनकर मैं बता सकती थी की ये मुगलसराय पैसेंजर है, तूफ़ान एक्सप्रेस या कोई मालगाड़ी। 


सन 1934 के जनवरी महीने में हमारे गाँव और उसके आस-पास के इलाके में एक भारी भूकम्प आया था। उसमे चारो ओर जान-माल की काफी क्षति हुई थी। उस समय मैं अपने माँ के गर्भ में थी। मेरी माँ बताती थी कि उसी के सात महीने बाद मेरा जन्म हुआ। उस ज़माने में जन्म दिन याद रखने और मनाने की कोई प्रथा नहीं थी। लेकिन 1934 का वो भूकम्प मेरे जन्म की तिथि निर्धारित करने में सहायक सिद्ध हुआ।


आज जब मेरे छियासी साल पुरे हो चुके हैं, बहुत सी पुरानी बातें याद आती है। जीवन से जुड़ी कई घटनाएँ, किस्से, कहानियां मेरे जेहन में कुलबुलाती हैं, बाहर आने को आतुर हैं। ऐसा लगता है की कोई सुननेवाला मिले तो उससे अपनी उन खट्टी-मीठी यादों को साझा करूँ।


सन 1942 की कई बातें मुझे याद है, भारत छोडो आंदोलन के अलावा भी। तब मैं आठ साल की थी। उसी साल मेरी सबसे बड़ी बहन सत्यभामा की शादी हुई थी, मोकामा के सकरवार टोला मे। उसकी शादी की घटनाएँ मुझे उतना याद नहीं है। 


लेकिन उसके ठीक आठ दिन बाद हमारे गांव में जो एक और बारात आई थी, मोकामा के सकरवार टोला से ही, उसकी कई बातें मुझे आज भी स्पष्ट रूप से याद है। बारात काफी सज-धज कर आई थी--- उसमे कई हाथी, घोड़ों के अलावा एक मोटर गाड़ी भी थी, सकरवार टोला के नामी रईस बृजनाथ प्रसाद की। मेरे लिए किसी मोटर गाड़ी को देखने का यह पहला अनुभव था। दूल्हे की पालकी, ढ़ोल, बाजे, बत्ती के साथ बारात के सबसे आगे थी। हमारे छोटे से गांव के लिए यह एक अदभुत नज़ारा था। जब बारात दुल्हन के घर के सामने रुकी, तो सारे गांव के लोग जमा थे, बारात को देखने के लिए। 


अचानक किसी ने दूल्हे का चेहरा देखा और लोग बातें करने लगे कि 'लड़का बूढा है', 'लड़का बूढ़ा है'। धीरे-धीरे गांव के लोग इकट्ठा हो गए और कहने लगे कि ये शादी हम नहीं होने देंगे। एक सोलह साल की लड़की की शादी पचास साल के लड़के से नहीं हो सकती। बारात के लोग जब बातचीत से नहीं माने तो लोगों ने उनके ऊपर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया, जिसमे मोटर गाड़ी का शीशा टूट गया। विरोध के इस पूरे अभियान में मेरे बड़का बाबू सबसे आगे थे। बड़का बाबू मेरे बाबूजी के तीन भाइयों में सबसे बड़े थे। बाबूजी भी वहीं थे पर वो बारात के लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे थे। अंत में दूल्हे एवं बारात को उलटे पांव लौटना पड़ा। जाते-जाते मोकामा के लोगों ने धमकी दी कि शेरपुर का कोई भी आदमी जब कभी भी मोकामा आएगा तो हम इसका बदला जरूर लेंगे।


इस बीच हमारे गांव के राम बालक पहलवान दुल्हन को गोद में लेकर तेजी से अपने घर चले गए। हमलोगो ने जैसे ही देखा तो हमलोग भी उनके पीछे-पीछे गए। उन्होंने दुल्हन को एक कमरे में बंद कर दिया। राम बालक पहलवान के घर में भी उसी दिन एक लड़की की शादी थी, जिसके लिए पास के गांव, दरियापुर, से बारात आई हुई थी। गांववालों ने निश्चय कर लिया कि दरियापुर से आये बारात में से ही एक सुयोग्य वर ढूंढकर उस लड़की की शादी कर दी जाएगी। सचमुच वर मिल गया और उसकी शादी अगले दिन एक जवान युवक से हो गयी। एक ही दिन में उस लड़की के जीवन में एक नाटकीय बदलाव आया। कहाँ वह मोकामा के एक बुजुर्ग की पत्नी बनने वाली थी, अब उसकी शादी दरियापुर के एक नवयुवक से हो गयी।  


इस शादी से जुडी कई किस्से, कहानियां बाद में काफी प्रचलित हुईं। हमें पता चला कि मोकामा की बारात में जो बुजुर्ग व्यक्ति दूल्हा बनकर आये थे उनका नाम था सन्तोखी सिंह। लड़की के पिता, महि सिंह, उन्हीं की जमीन पर मोकामा टाल में खेती करते थे और सन्तोखी सिंह के कर्जदार थे। इसीलिए गांव के लोगों को शक था की शादी के नाम पर वो अपनी बेटी को बेच रहें हैं। इस पुरे प्रकरण में महि सिंह की बड़ी बेटी, मुरली, की भूमिका काफी अहम थी। वह खुद तो बाल विधवा थीं, लेकिन अपनी छोटी बहन की शादी सन्तोखी सिंह से करवाने में काफी सक्रिय रहीं। इस सन्दर्भ में लोगों ने मुरली पर एक गीत रचा, वह गांव में काफी लोकप्रिय हुआ :


कहमॉ के दाली-चौरा, कहमॉ के टोकना,
केकरा ले खिचड़ी बनैलें, छौंरी मुरली। 


मोकमा के दाली-चौरा, शेरपुर के टोकना 
दरियापुर ले खिचड़ी बनैलें, छौंरी मुरली। 


अपनौ खैलें, दरियापुर के खिलैलें 
सन्तोखी ले जूठा नरैलें, छौरी मुरली।             


Wednesday, 1 January 2020

प्रवासी पिता


1970 में प्रवासी पिता का पत्र अपने पुत्र के नाम:


प्रवासी प्रीतम

पढ़िए, एक 'प्रवासी प्रीतम' ने अपनी 'प्रिये' से जनवरी 1970 में क्या कहा था?